
Spoiler warning: this review contains spoilers.
TL;DR
जीवन की प्राथमिक प्रेरणा सुख नहीं, बल्कि अर्थ है, और अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी व्यक्ति अपना दृष्टिकोण चुनने की स्वतंत्रता रखता है, जो मनोवैज्ञानिक उत्तरजीविता को बनाए रख सकता है।
समीक्षा
इस पुस्तक में लेखक ने नाजी एकाग्रता शिविर (concentration camp) के अपने जीवन के अनुभवों के बारे में लिखा है, जहाँ उन्होंने अपनी पत्नी को भी खो दिया था।
फ्रैंकल का कहना है कि अत्यधिक कष्ट में भी, मनुष्य एक अंतिम स्वतंत्रता बनाए रखता है: अपना दृष्टिकोण चुनने की क्षमता। उन्होंने देखा कि एकाग्रता शिविर में वे लोग अंततः जीवित रहे जिनमें अर्थ की भावना थी। उनके अनुसार अर्थ तीन तरीकों से पाया जा सकता है:
- कार्य या उपलब्धि के माध्यम से
- प्रेम या जुड़ाव के माध्यम से
- अपरिहार्य होने पर गरिमापूर्ण दुख के माध्यम से
उनका तर्क है कि जब अर्थ गायब हो जाता है, तो मनोवैज्ञानिक पतन शुरू हो जाता है—यहाँ तक कि शारीरिक रूप से आरामदायक परिस्थितियों में भी। बाद में फ्रैंकल ने लोगोथेरेपी विकसित की जो शिविर में उनके अनुभवों पर आधारित थी। सच कहूँ तो इस किताब में जीवन बदल देने वाले बहुत से विचार हैं, इसे जानने के लिए आपको इसे पढ़ना ही होगा।